वास्तुशास्त्र का परिचय
वास्तुशास्त्र की जानकारी हमें ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद के साथ-साथ पुराणों एवं अन्य ग्रन्थों से भी मिलती है। परंतु इसके सिद्धांतों का उल्लेख सर्वप्रथम ऋग्वेद में किया गया। इन चार वेदो के पष्चात् चार उपवेद भी लिखे गये। इन्हीं उपवेदों में स्थापत्य वेद भी है जो अथर्ववेद का उपवेद है। कालान्तर में यह स्थापत्यवेद ही वास्तुषास्त्र के रूप में विकसित हुआ। इसके साथ ही मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण, अग्नि पुराण, वायु पुराण, गरूड़ पुराण तथा भविष्य पुराण आदि से भी वास्तु के बारे में जानकारी मिलती है। मत्स्य पुराण में शिलाओं पर नक्काशी, समारोह स्थल की स्थिति एवं साज-सजा के सिद्धांतो की विस्तृत चर्चा की गई । नारद पुराण में मंदिरो के विषय में अनेक उल्लेखनीय तथ्य देखने को मिलता है।
इसी प्रकार गरूड़ पुराण में रिहायशी भवनों तथा मंदिरो से संबंधित सिंद्धांतो की विस्तृत चर्चा है। मंदिरो के विषय में वास्तु सिद्धांतो की व्याख्या वायु पुराण भी करता है। परंतु इसमें उन मंदिरो का वर्णन है जो अधिक ऊँचाई पर बनाये गयें है। स्कंद पुराण में दिए गए नगर योजना सिद्धांतो को यथासंभव ठीक ढंग से अपनाया जाए तो पश्चात्य सभ्यता के महानगर भी उस कृति के समक्ष फीके पड़ जाएंगे। इसी तरह अग्नि पुराण में रिहायशी भवन की विस्तृत व्याख्या मिलती है।
इन प्राचीन ग्रंथो के अतिरिक्त अन्य ग्रंथो में भी वास्तु की व्यापक एवं विस्तृत जानकारी मिलती है। रामायण, महाभारत, चाणक्य के अर्थशास्त्र, जैन एवं बौद्ध ग्रंथ वृहत् संहिता, समरांगण सूत्रधार, विश्वकर्मा प्रकाश, मयमत, मानसार, वास्तु राजवल्लव, वराहमिहिर के ज्योतिष ग्रंथ वृहत्संहिता आदि विभिन्न ग्रंथो में वास्तुशास्त्र के महत्व एवं उपयोगिता का वर्णन है। इसके अतिरिक्त भृगु, शुक्राचार्य और वृहस्पति जैसे अठारह महर्षियों ने इस पर विस्तृत प्रकाश डाला है। ये सभी ग्रंथ अपने आप में व्यापक हैं एवं विस्तृत वास्तु सिद्धांतो को समेटे हुए है परंतु मालवा के प्रसिद्ध शासक भोज परमार ने ग्यारहवीं शताब्दी में समरांगण सूत्रधार लिखा जो वास्तुशास्त्र का प्रमाणिक एवं अधिकृत ग्रंथ है। इसमें सभी पूर्ववर्ती ग्रंथो के सिद्धांतो का समावेश है। साथ ही इसमें वास्तु दोषों के निवारण के अत्यंत सरल उपाय बतायें गए हैं ये सारे उपाय भवन को किसी तरह की क्षति पहुँचाए बगैर किए जा सकते हैं।
वास्तुशास्त्र का प्रादुर्भाव वैदिक काल में ही हुआ तथा वैदिक काल से तेरहवीं शताब्दी तक वास्तु कला का प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग होता रहा परंतु इसके बाद मुगलों के आने पर इस कला का प्रचलन कम होता गया और धीरे-धीरे लुप्तप्रायः हो गई किन्तु दक्षिण भारत में इस कला का प्रचलन जारी रहा। हमारे यहां जैसे ही अंग्रेजो का शासन काल शुरू हुआ इस अद्भूत कला का हा्रस होता चला गया। लोग अपने जीवन में इसे अपनाने के बजाय ढोंग मानने लगे परन्तु आज के भौतिकता भरे जीवन में जहाँ पल-पल तनाव, परेशानियां एवं दुखः की अनुभूति हो रही है यह शास्त्र मनुष्य को सुख-समृद्धि ऐश्वर्य एवं शांति देने में सामर्थ्यवान साबित हो रहा है। इसी कारण से इस मृत प्रायः शास्त्र को वर्तमान समय में हमलोग स्वागत कर रहें है एवं इसके सिद्धांतो को अपने जीवन में अपनाकर सुख समृद्धि एवं शांति की प्राप्ति कर रहें हैं।वास्तुशास्त्र का उदय तथा उसकी संरचना सृष्टि के पंचभूतात्मक सिद्धांत पर ही आधारित है। जिस प्रकार हमारा शरीर पंचमहाभूतात्मक तत्वों से मिलकर बना है उसी प्रकार किसी भी भवन के निर्माण में पंचतत्वों का पर्याप्त ध्यान रखा जाए तो उसमें रहने वाले सुख से रहेंगे। ये पंचमहाभूत-पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश है। हमारा ब्रह्याण्ड भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इसलिए कहा जाता है ‘यत् पिण्डे तत् ब्रह्याण्डे’।
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