जिस प्रकार शरीर में इन तत्वों की कमी या अधिकता होने से व्यक्ति अस्वस्थ्य या रूग्ण हो जाता है उसी प्रकार भवन में इन तत्वों के असंतुलित होने से उसमें निवास करने वाले को नाना प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही प्रकृति के अनन्त शक्तियों में से कुछ शक्तियां हमें प्रभावित करती है जैसे सूर्य की स्थिति, पृथ्वी पर गुरूत्वाकर्षण शक्ति ,आभामंडल की शक्तियां, चुम्बकीय शक्ति तथा विद्युत चुम्बकीय शक्ति इत्यादि। यह शक्तियां निर्माण किये गए भवन में विद्यमान रहती है जो मानव शरीर की विद्युत चुंबकीय शक्ति को प्रभावित करके शुभ या अशुभ फल देती है। यह शक्तियांँ जगह-जगह पर पृथ्वी एवं मानव पर हमेशा अलग-अलग प्रभाव एवं महत्व रखती है। यही कारण है कि वास्तु शास्त्र सदैव प्रत्येक स्थान पर एक समान फल नही देता है। यह परिवर्तन मानव के ग्रह नक्षत्र तथा भौगोलिक अक्षांश के अनुसार बदलते रहती है। अन्यथा सभी भवनें एक समान ही फल देने वाले होते। ब्रह्यंड की सारी शक्तियांँ प्रकृति और हमारे शरीर को प्रभावित करती रहती है। यदि प्रकृति के विरूद्ध जाएंगे तो प्रकृति के कुप्रभाव का समाना करना पडेगा। फलस्वरूप हमारी अवनति होगी और यदि प्रकृति के अनुरूप चलेंगे तो सुप्रभाव पडेगा जिसके फलस्वरूप उन्नति होगी जो समृद्धशाली एवं सुखमय जीवन के लिए सहायक होगी। अतः यह आवश्यक है कि प्रकृति के अनुसार हम अपने जीवन को व्यवस्थित करें। वास्तुशास्त्र का सिद्धांत यह भी बतलाता है कि प्रकृति से सामंजस्य स्थापित कर भवन निर्माण किया जाए तो मनुष्य सुख-शांति एवं स्वस्थयमय जीवन प्राप्त करता है। वास्तुशास्त्र के संबंध में हालायुद्धकोष में कहा गया है-
वास्तु संक्षेपतो वक्ष्ये गृहादो विघ्ननाशनम्।
ईशानकोणादारभ्य ह्योकाशीतिपदे त्यजेत्।।
अर्थात् वास्तु संक्षेप में ईशान आदि कोणों से प्रारम्भ होकर गृह-निर्माण की वह कला है जो गृह में निवास करने वालों को प्राकृतिक विघ्न, उत्पातों व उपद्रवों से बचाती है।
अमर कोष के अनुसार
‘‘गृहरचना वच्छिन्न भूमे’’
गृहरचना के योग्य अविछिन्न भूमि को वास्तु कहते है। वास्तु वह स्थान कहलाता है जिसपर कोई इमारत खडी हो अथवा घर बनाने लायक जगह को वास्तु कहते है। इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है- वास्तु वस्तु से संबंधित वह विज्ञान है जो भवन निर्माण से लेकर भवन में उपयोग की जाने वाली वस्तु के बारे में मनुष्य को बतलाता है।
इसी प्रकार मालवा के प्रसिद्ध शासक भोज परमार ने ग्यारहवीं शताब्दी में स्वरचित ग्रंथ समरांगण सूत्राधार के पहले अध्याय के पांचवे श्लोक में कहा है-
वास्तुशास्त्रादृते तस्य न स्याल्लः क्षणनिश्यचः।
तस्माल्लोकस्य कृपया शास्त्रमतेदृदीर्यते।।
अर्थात् वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों के अतिरिक्त अन्य कोई प्रकार नहीं है जिससे यह निश्चित किया जा सके कि कोई भी भवन सही निर्मित है अथवा नहीं। संक्षेप में वस्तु को सुनियोजित तरीके से रखना ही वास्तु है।
समारांगण सूत्र धनानि बुद्धिश्च सन्तति सर्वदानृणाम्।
प्रियान्येषां च सांसिद्धि सर्वस्यात् शुभ लक्षणमफ।।
यात्रा निन्दित लक्ष्मत्र तहिते वां विधात कृत।
अथ सर्व मुपादेयं यभ्दवेत् शुभ लक्षणम्।।
देश पुर निवाश्रच सभा वीस्म सनाचि।
यद्य दीदृसमन्याश्रच तथ भेयस्करं मतम्।।
वास्तु शास्त्रादृतेतस्य न स्यल्लक्षनिर्णयः।
तस्मात् लोकस्य कृपया सभामेतत्र्दुरीयते।।
अर्थात्, वास्तु शास्त्र के अनुसार भली भांति योजनानुसार बनाया गया घर सब प्रकार के सुख, धन-संपदा, बुद्धि, सुख-शांति और प्रसन्नता प्रदान करने वाला होता है और ऋणों से मुक्ति दिलाता है। वास्तु की अवहेलना के परिणामस्वरूप अवांछित यात्राएं करनी पड़ती है, अपयश, दुख तथा निराशा प्राप्त होते हैं। सभी घर, ग्राम, बस्तियां और नगर वास्तु शास्त्र के अनुसार ही बनाये जाने चाहिए। इसलिए इस संसार के लोगों के कल्याण ओर उन्नति के लिए वास्तु शास्त्र प्रस्तुत किया गया है। इसी तरह नारद संहिता में कहा गया है भवन में निवास करने वाले गृह स्वामी को भवन प्रत्येक रूप से शुभ फलदायक, सुख-समृद्धि प्रदाता, ऐश्वर्य, लक्ष्मी एवं धन को बढाने वाला, पुत्र-पौत्रादि प्रदान करने वाला हो इसका विचार वास्तु के अंतर्गत किया जाता है। सचमुच वास्तुशास्त्र एक गहन विषय है इसका वैज्ञनिक एवं आध्यात्मिक आधार है। वास्तु के अनुसार बने भवन मंगलदायक एवं कल्याणकारी होता है परंतु इसके नियमों का उल्लंधन से उसमंे निवास करने वाले के लिए विध्वंसकारी एवं विनाशकारी होता है। वास्तु के अनुसार बने भवन मानसिक, शारीरिक एवं भावनात्मक सुख देते हैं। इसी तरह वास्तु के अनुरूप बने परिसर शांति खुशहाली एवं समृद्धि देते हैं।
1 Comment
Comments are closed.